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संस्कृति और भक्ति का महा पर्व मधुश्रावणी पूजा नवविवाहित महिलाओं ने धूम धाम से मनाया ।

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कटिहार/नीरज झा --: सावन माह के कृष्ण पक्ष के पंचमी से आरंभ होने वाला सुहागनों महिलाओं के लिए मधुश्रावणी महापर्व शुक्ल पक्ष तृतीया को  धूम धाम से सम्पन किया गया । मिथला समाज में पूजे जाने वाले मधुश्रावणी पूजन का विशेष महत्व है यह पूजा 13 दिनों तक नव विवाहिता पूरे विधी विधान से सोलह सिंगार कर करती है

पूजा के वाद कथा का विशेष महत्व :








ऐसी मान्यता है कि माता पार्वती सबसे प्रथम मधुश्रावणी व्रत रखी थी जन्म-जन्मांतर तक भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त हो ब्रत की थी यह बात हर नवविवाहिताओं के दिलो-दिमाग में रहता है यही कारण है कि इस पर्व को पूरे मनोयोग से हर नाव विवाहिता मनाती है । इस पर्व के दौरान माता पार्वती व भगवान शिव से संबंधित मधुश्रावणी की कथा सुनने का प्रावधान है खास कर समाज की बुजुर्ग महिलाओ  द्वारा कथा सुनाया जाता है बासी फूल ससुराल से आये पूजन सामग्री दूध-लावा फल फूल अन्य सामग्री के साथ नाग देवता की भी पूजा की जाती है माना जाता है कि इस प्रकार की पूजा-अर्चना से पति दीर्घायु होती हैं इस लिए शादी के प्रथम वर्ष इस त्योहार का मनाने का अपने-आप में विशेष महत्व है । जिसकी अनुभूति को नवविवाहिता  ही कर सकते हैं ।

क्या कहतीं हैं नव विवाहिताएं :

कटिहार के हसनगंज की नवविवाहित खुशबू झा ने बतातीं हैं कि यह पूजा का अलग ही महत्व है इस पूजा में लगातार सोलह दिनों तक नव विवाहित महिलायें प्रतिदिन एक बार अरवा भोजन करती है इसके साथ ही नाग-नागिन,हाथी के ऊपर गौरी-शिव आदि की प्रतिमा बनाकर प्रतिदिन विभिन्न प्रकार के फूलों,मिठाईयों एवं फलों से पूरे विधि विधान से पूजन किया जाता है । सुबह नाग देवता को दूध लावा का भोग लगाया जाता है उसके वाद अरवा भोजन किया जाता है ।

मधुश्रावणी पूजा का अलग है महत्व :

मधुश्रावणी पूजन का काफी महत्व बताया जाता है कि महिलाओं के द्वारा किया जानेवाला यह पर्व पति की लंबी आयु तथा शांति ऐश्वर्या के साथ साथ हर तरह के सुख-शांति के लिये की जाती है । पूजन करने दौरान मैना पंचमी, मंगला गौरी,पृथ्वी जन्म,पतिव्रता, महादेव कथा,गौरी तपस्या,शिव विवाह, गंगा कथा,बिहुला कथा तथा बाल वसंत कथा सहित 14 खंडों में कथा का श्रवण किया जाता हैै । प्रतिदिन संध्याकाल में महिलायें आरती,सुहाग गीत तथा कोहवर गाकर भगवान भोले शंकर को प्रसन्न करने का प्रयत्न करती हैं ।

मायके-ससुराल दोनों के सहयोग से होती है पूजन :

इस पूजन में मायके तथा ससुराल दोनों पक्षों का सहयोग आवश्यक माना गया इसके बगैर पूजा सफल नही मानी जाती  है। पूजन करने वाली नव विवाहिताएं ससुराल पक्ष से प्राप्त नये वस्त्र धारण करती हैं। परंपरा है कि नव विवाहिता के मायके के सभी सदस्यों के लिये कपड़ा, व्रती के लिये जेबरात, विभिन्न प्रकार के कपडडे भोज के लिये सामान भी ससुराल से ही आता है वहीं चना को अंकुरित कर इसे भेजे जाने का भी रिबाज रहा है । ससुराल से नाग-नागिन सहित विषहारा के सभी बहनों को मिट्टी से बना उसे रंग-रोगन कर,मैना पत्ता व अन्य पूजा सामग्री के साथ भेजा जाता है. पूरे पूजा के दौरान आस्था व श्रद्धा के साथ विषहारा की पूजा-अर्चना की जाती है और साथ ही गीत गाये जाते हैं । हर दिन पांच बीनी कथा भी ब्रतियों को सुनायी जाती है कहा जाता है कि जो महिला ये पांचो बीनी नियमित रूप से पढती हैं उसे हर प्रकार का सुख प्राप्त होता है और परिवार में कभी भी सर्पदोष की शिकायतें नहीं होती ।

मैना पत्ता पर होती है पूजा :

मधुश्रावणी पूजन मे नवविवाहिता मैना पात पर नाग-नागिन की बनी आकृति पर दूध-लावा चढाकर अपने सुहाग के साथ-साथ परिवार के लिए मंगलकामना करती है.कहा जाता है कि माता पार्वती ने अपने कठिन व्रत के फलस्वरूप इसी सावन मास मे शंकर जी को वर के रूप में प्राप्त की थी । मौना पंचमी के मौके पर नाग देवता की पूजा के बाद शाम में धान का लावा और मिट्टी को मिलाकर तथा इसे अभिमंत्रित कर घर आंगन दरवाजा के विभिन्न भागों में छीटा जाता है तथा मधुश्रावणी में मिट्टी और गोबर से बने नाग की पूजा की जाती है.

पूजा में भाई का भी विशेष योगदान :

इस पूजन में नवविवाहिता के भाई का बहुत ही बड़ा योगदान रहता है.प्रत्येक दिन पूजा समाप्ति के बाद भाई अपनी बहन को हाथ पकड़ कर उठाता है । नवविवाहिता अपने भाई को इस कार्य के लिए दुध,फल आदि प्रदान करती है ।

टेमी दागने की भी परंपरा :

पूजा के अंतिम दिन पूजन करने वाली महिला को कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ता है । टेमी दागने की परंपरा में नव विवाहिताओं को गर्म सुपारी,पान एवं आरती से हाथ एवं पांव को दागा जाता है.इसके पीछे मान्यता है कि इससे पति-पत्नी का संबंध मजबूत होता है ।

विभिन्य पकवानों से सजती है डलिया :

पूजा के अंतिम दिन 14 छोटे बर्तनों में दही तथा फल-मिष्ठान सजा कर पूजा किया जाता है । साथ ही 14 सुहागन महिलाओं के बीच प्रसाद के रुप मे वितरण कर घर और ससुराल पक्ष से आये अपने से बड़े बुजूर्ग से आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है उसके उपरांत पूजा का संपन्न की जाती है ।

आज भी बरकरार हैं पुरानी परंपरा :

सदियों से चली आ रही मिथिला संस्कृति का महान पर्व आज भी बरकरार है और नवविवाहिता श्रद्धा-भक्ति के साथ पूजा करती हैं इस क्रम में महिलाएं समूह बनाकर मैथिली गीत गाकर भोले शंकर को खुश करती हैं और आने वाले पीढ़ी को आगाज करती हैं कि इस परंपरा को बरकरार रखना है इस पर्व में मिथिला संस्कृति की झलक ही नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की भी झलक देखने को मिलती हैं इस खास पूजन में नवविवाहिता भारतीय संस्कृति के अनुसार वस्त्र व श्रृंगार से सुसज्जित होतीं हैं......

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